किन्नू और मुन्ना की अलौकिक मैत्री अचंभित कर देने वाली है - तूलिका

 



मनीष श्रीवास्तव लिखित उपन्यास "मैं मुन्ना हूँ" का आरंभ ही कुछ विचलित कर देने वाले प्रसंगों से होता है जो हमें न केवल सत्य से अवगत होने को सचेत करते हैं बल्कि हमें आने वाले भावनात्मक आघातों को सहने को तैयार भी करते हैं। मुन्ना की यात्रा के आरंभ से ही उसके प्रिय मित्र किन्नू की उपस्थिति उत्सुक करती है। आगे बढ़कर यह स्पष्ट होता है कि किन्नू एक काल्पनिक चरित्र है जो मुन्ना को उसके जीवन की विचलित करने वाली यात्रा से अवगत कराने वाला सूत्रधार भी है और उसके जीवन में जिस संबल और स्नेह  कमी रही है उसका प्रतिरूप भी। किन्नू मुन्ना का हाथ थामता भी है और छोड़ता भी है। उसका सहारा भी बनता है और उसे सहारा न लेना पड़े इस काबिल भी बनाता है। किन्नू और मुन्ना की अलौकिक मैत्री मुन्ना के साथ साथ पाठकों को भी दैविय शक्तियों में विश्वास ढूंढने का साहस देते हैं। 


पूरे उपन्यास में मुन्ना केवल एक चरित्र नहीं रहता वह एक भोगे हुए यथार्थ का छुपाया हुआ प्रतिरूप हमारे समक्ष उजागर कर रहा है जिसे जीवन के अलग पड़ावों में हम सब ने जिया है, भोगा है और छुपाया है। 


मुन्ना अपनी पूरी यात्रा में केवल अपनी एक व्यथा लेकर नहीं जूझ रहा। कुछ बचपन की चोटें किस सीमा तक हमारे जीवन और संबंधों को आघात पहुँचा सकती हैं वह सब मुन्ना हमें दिखाता चलता है। वह जीवन के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ हमारे पारिवारिक, दुनियावी संबंधों की भी गांठ खोलकर दिखाता है। जिन रिश्तों पर उसका विश्वास प्रबल रहा वहीं से उसे सबसे अधिक आघात मिले। और समय के साथ जब मुन्ना अनाम, अनकहे रिश्तों में उतरने लगता है तब उसे उन्हीं रिश्तों में आत्मिकता से भी अधिक स्नेह और अपनापन मिलता जाता है। 


उपन्यास "मैं मुन्ना हूँ" मुन्ना की पीड़ित छवि बनाकर उसे सहानुभूति नहीं दिलवा रहा, वह मुन्ना का पूर्ण व्यक्तित्व निश्छलता से हमें दिखा रहा। उसका बचपना, उसकी गलतियां, उसके बचपन में जबरदस्ती जो वयस्क मनोस्थिति उसे ढोनी पड़ती है वह सब मिलकर मुन्ना का चरित्र बनाते हैं । मुन्ना की बाहरी, दुनियावी यात्रा हमें उन सब घटनाओं और प्रसंगों से परिचित कराती है जिन्होंनें मुन्ना के आंतरिक अवचेतन की यात्रा में विपरीत मनोस्थिति उत्पन्न कर उसे जटिल बनाया और जिसे पारकर मुन्ना आज हम पाठकों के सामने आया है। 


इस उपन्यास को पढ़ते समय आप मुन्ना के लिए रो पड़ें यह तो निश्चित है पर अचंभित करने वाले क्षण तब आएंगे जब मुन्ना के जीवन के कुछ प्रसंग आपको अपने जीवन की उन कुछ घटनाओं की याद दिलाएंगे जिनके बारे में आप अबतक यह जान नहीं पाए हैं कि उस क्षण आप भी मुन्ना ही थे! इस आत्मबोध के लिए यह उपन्यास पढ़ना सबके लिए आवश्यक है!


~तूलिका स्वाती

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