मुन्ना सबके अंदर है - यशवंत देशमुख

 



कुछ विषय आपके मन , या परिस्थिति , या फिर आपके व्यक्तिगत या साझा अनुभवों के साथ इतने गहरे पैठे होते हैं , की उनको कुरेदने का साहस खुद कोई नहीं कर पाता है । या तो बाहरी हालात उन विषयों पर वापस आने की हिम्मत देते हैं , या फिर किसी और की हिम्मत आपको केवल इस बात का हौसला देती है की तुम्हें खुद कुछ कहना या करना नहीं है बल्कि कहने और करने वाले के बगल में जा कर केवल खड़े होना है । समर्थन देने या प्रोत्साहन देने के लिए नहीं , बल्कि केवल मूक भागीदार होने की पुष्टि करने के लिए । केवल ये जताने के लिए , कि पूरी कहानी या पूरा उपन्यास न सही, पूरे उपन्यास में कोई भूमिका निभा रहा किरदार विशेष भी न सही, लेकिन इस कहानी का कोई न कोई एक पन्ना हमारी आपकी ज़िंदगी को मानो बाँच कर निकल रहा होता है ।

उस पन्ने को देखने या सुनने या बाँचने के लिए भी साहस चाहिए। सोचिए की फिर बयान करने के लिए कितने साहस की जरूरत होती होगी ! “मैं मुन्ना हूँ“ करीब एक महीने मेरी डेस्क पर रही और में पढ़ने का साहस न जुटा सका ।

ठीक वैसे ही जैसे मैं उस दिन तक “तारे जमीन पर“ नहीं देख पाया, जिस दिन तक मेरी बिटिया ने मुझे अंतिम सीन दिखा कर आश्वस्त नहीँ कर दिया की मैं इस विषय को री-विज़िट करते समय टूट कर नहीं बल्कि खुद को सम्हाल कर ही बाहर निकलूँगा । मनीष भाई भी पूरी सहजता और सरलता से इंतजार करते रहे की कभी तो मैं अपने डर को दूर कर उनका लिखा पढ़ूँगा। उनका सब्र और उनकी कलम की हिम्मत सर आँखों पर । पढ़ ही गया । और मेरे अंदर का मुन्ना टूट कर नहीं , बल्कि सहेज कर ही बाहर आया । झूठ नहीं बोलूँगा , अंत पहले पढ़ा । अंदर बैठे मुन्ना को दोबारा तोड़ने की हिम्मत नहीं थी , केवल इसलिए । अब चाहूँगा की हर कोई पढे , ताकि सबके अंदर मुन्ना के अनुभव से गुजरे पन्नों को ठहराव मिल सके ।

किसी का केवल एक पन्ना होगा , किसी की पूरी किताब होगी। हो सकता है आपके अंदर के मुन्ना की केवल एक लाइन या एक पैरा ही हो , लेकिन होगी जरूर। क्यों की मुन्ना सबके अंदर है। उसे सबने दफनाया है जीते जी। जरूरत नहीं थी, लेकिन फिर भी मिट्टी डाल के नीचे, बहुत नीचे दबा के रखा है हम सबने उसको।

हद्द तो ये है की जिनके कारण हमने उसे दबा के रखा वो सभी किरदार हमारे आसपास अभी भी अनहद घूमते हैं । वो सभी खुली हवा में घूमते हैं और हमने मुन्ना की सांस रोक राखी है । उस मुन्ना को सांस लेने दीजिए । यशवंत देशमुख २४ जनवरी २०२१

Comments

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